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आज आसमां में होगी पतंगों की कलाबाजी

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नागपुर. मकर संक्रांति के मौके पर रविवार को रंग-बिरंगी पतंगों से आसमान में सतरंगी छटा बिखरेगी। पतंगबाजी को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह है।ये पर्व रविवार को पारंपरिक तरीके से मनाया जाएगा। इस अवसर पर मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। बाजारों में तिल के लड्डू तथा तेल से बने हुए अनेक मीठे व्यंजन भी तैयार किए गए हैं। घर-घर में लड्डू बन रहे हैं। इस वर्ष तिल के भाव पिछले वर्ष के मुकाबले डबल होने के बावजूद भी गृहिणियों द्वारा महंगाई की परवाह किये बगैर लड्डू बनाने के लिए तिल और गुड़ की बाजार से खरीदी की है। वहीं बाजारों में तिल्ली की रेडीमेड मिठाइयों की डिमांड बढ़ गई है। कई घरों में खिचड़ी बनाई गई है। इस दिन दान का भी महत्व है. धार्मिक स्थलों पर पूजा अर्चना करने के बाद सूर्य उपासना की जाती है.

उड़ान भरेंगे छोटा भीम और ड्रैगन

रंग-बिरंगी पतंगों के साथ आसमान में छोटा भीम और ड्रैगन वाली पतंगें भी छाएंगी. बच्चों को स्पाइडर मैन, छोटा भीम, डोरेमॉन, बैनटेन, एयरोप्लेन, बटरफ्लाई व चमगादड़, पैराशूट व ड्रैगन वाली पतंगों के साथ चरखी खूब भा रही हैं. बाजार में पतंग की कीमतें उसके बड़े-छोटे आकार और पेपर क्वालिटी के हिसाब से हैं. सादे रंग के छोटे साइज के पतंग 5 रुपये से शुरू हैं. वही बड़े साइज के मजबूत पतंग 400 रुपये तक बाजार में बिक रही हैं. इनके अलावा मांझे की कीमत 80 रुपए रील से शुरू है.

पुण्यकाल का मुहूर्त

 रविवार को सुबह 7:15 से दोपहर 12:30 बजे तक पुण्य काल का मुहूर्त है अवधि 5 घंटे 14 मिनट तक रहेगी. महापुण्य काल सुबह 7:15 से 9:15 तक रहने वाला है अवधि 2 घंटे तक होगी. दोपहर 2:16 से लेकर दोपहर 2:58 तक विजय मुहूर्त तथा दोपहर 12:09 से लेकर दोपहर 12:52 तक अभिजीत मुहूर्त रहने वाला है. सूर्यास्त के पूर्व दान, सूर्य उपासना तथा तीर्थ स्थानों पर स्नान आदि किया जाएगा. सूर्य के उत्तरायण होने पर मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है और खरमास का समापन हो जाता है.

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विट्ठल,विट्ठला….हरी ॐ

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आज देश में आषाढ़ी एकादशी या देवशयनी एकादशी मनाई जा रही है. इसे हिंदू कैलेंडर के आषाढ़ महीने के दौरान मनाया जाता है. यह चार महीने की अवधि के लिए भगवान विष्णु (भगवान विट्ठल) की शेषनाग पर शयन की शुरुआत का प्रतीक है जिसे चातुर्मास भी कहा जाता है.

महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी का विशेष महत्व है. पुणे के समीप देहु और आलंदी से पंढरपुर के प्रसिद्ध विठोबा मंदिर तक पंढरपुर यात्रा (वारी) निकाली जाती है जो  हजारों लोगों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती है. जिन्हें वारकरी कहा जाता है.पंढरपुर यात्रा विठोबा मंदिर की तीर्थयात्रा है, जिसे विट्ठल रुक्मिणी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, जो भगवान कृष्ण को समर्पित है.

पंढरपुर आषाढ़ी एकादशी वारी यात्रा 700 वर्षों से चल रही है. यह यात्रा पुणे जिले के देहू में संत तुकाराम मंदिर से शुरू होती है. वारकरी या तीर्थयात्री तुकाराम महाराज पालखी जुलूस का अनुसरण करते हैं. इस मुख्य जुलूस में पुणे के पास आलंदी से संत ज्ञानेश्वर पालखी शामिल होते हैं. रास्ते में अन्य शहरों और गांवों से कई अन्य पालकियां यात्रा में शामिल होती हैं.

भक्तिपूर्ण उत्सव

इस दिन भक्तगण संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के भजन सुनते हैं. दिन भर  मंदिर में भजन मंडलियां भजन गाती हैं. एकादशी के दिन मंदिर में लगभग छह लाख श्रद्धालु आने की उम्मीद है. सुबह 4 बजे भगवान का महाभिषेक हुआ जिसके बाद मंदिर खुला रहेगा.406 साल पुराने म्हात्रे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा संत तुकाराम ने करवाई थी. मंदिर की मूर्तियां चंद्रभागा नदी में पाई गई थीं.

धरती पर विराजमान हैं ईश्वर

भगवान विट्ठल, श्रीकृष्ण ही हैं। इसके बारे में एक पौराणिक कहानी है। 6वीं सदी के संत पुंडलिक, माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन वे अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे कि श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ वहां प्रकट हो गए। वे पैर दबाने में इतने लीन थे कि अपने इष्टदेव की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। तब प्रभु ने उन्हें स्नेह से पुकार कर कहा, ‘पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।’ पुंडलिक ने जब उस तरफ देखा, तो भगवान के दर्शन हुए। उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए और वे पुन: पैर दबाने में लीन हो गए।

भगवान पुंडलिक की सेवा और शुद्ध भाव देखकर प्रसन्न हो गए और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंटों पर खड़े हो गए। कुछ देर बाद पुंडलिक ने फिर भगवान से कह दिया कि आप इसी मुद्रा में थोड़ी देर और इंतजार करें।भगवान को पुंडलिक द्वारा दिए गए स्थान से भी बहुत प्रेम हो गया। उनकी कृपा से पुंडलिक को अपने माता-पिता के साथ ही ईश्वर से साक्षात्कार हो गया। ईंट पर खड़े होने के कारण श्री विट्ठल के विग्रह रूप में भगवान आज भी धरती पर विराजमान हैं। यही स्थान पुंडलिकपुर या अपभ्रंश रूप में पंढरपुर कहलाया।

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युवाओं के चरित्र निर्माण में सहायक है हनुमान कथा

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श्री आयुर्वेद महाविद्यालय में हनुमान कथा का समापन

नागपुर. उत्तम चरित्र मानव को मानव बनाता है। चरित्र निर्माण में हनुमानजी ने उच्च मापदंड स्थापित किये है। रामकाज करना हनुमानजी का ध्येय था। उसी ध्येय पर अड़िग रहते हुए उन्होंने जीवन को सफल बनाया।  अपने संपर्क में आये हुए व्यक्तियों जैसे – सुग्रीव, विभीषण को भी श्रीराम  से मिलाया और सफल बनाया। अपने शिक्षा अध्ययन के कार्य को ध्येयपूर्वक करने से विद्यार्थी हनुमानजी की तरह सफल एवं उत्तम चरित्रवाले युवा बन सकते हैं।

हनुमान कथा के उपलक्ष्य में हनुमान जयंती के अवसर पर प्रातः शोभायात्रा एवं प्रभातफेरी का कीर्तन, ढोल ताशे के साथ आयोजन किया गया। इसके पश्चात् हवन एवं सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया गया।  इस अवसर पर कथा प्रेमियों के लिए महाप्रसाद रखा गया था।  कथा के प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन डॉ. लालचंद जैस्वाल द्वारा सम्पन्न हुआ। महाआरती में सक्करदरा पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक श्री धनंजय पाटील प्रमुख रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. गायत्री व्यास एवं आभार प्रदर्शन डॉ. रामकृष्ण छांगाणी ने किया।

 हनुमान कथा के सफलतार्थ  चोखानी जी, चंद्रशेखर शर्मा, संजय जोशी,  डॉ. संतोष शर्मा, नथमल अग्रवाल, डॉ. अर्चना दाचेवार, डॉ. मृत्युंजय शर्मा, डॉ. बृजेश मिश्रा, डॉ. हरीष पुरोहित, डॉ. शिल्पा वराडे, श्री हरीओम दुबे, डॉ. विनोद चौधरी, डॉ. देवयानी ठोकळ, डॉ. अश्विन निकम, डॉ. उदय पावडे, डॉ. अर्चना बेलगे, डॉ. सुरेखा लांडगे, श्री अंजनकर, डॉ. सुरेश खंडेलवाल, डॉ. जगमोहन राठी, डॉ. रचना रामटेके, डॉ. स्नेहविभा मिश्रा,  महाविद्यालय प्रतिनिधि डॉ. आदित्य हटवार, फड ने सहयोग दिया। 

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मकर संक्रांति पर साड़ियों की बहार

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काले रंग की डिमांड

वेब डेस्क.नागपुर. साड़ी हो या आभूषण महिलाओं का इनसे विशेष प्रेम है. मौका संक्रांति का हो तो फिर कहना ही क्या? महाराष्ट्र में परंपरा है कि मकर संक्रांति में हल्दी कुंकू, नववधू का तलवा, छोटे बच्चों की लूट जैसे कार्यक्रम महिलाओं के लिए होते हैं जिसके कारण नये कपड़ों की खासकर साड़ी और ड्रेसेस की मांग ज्यादा होती है. इस बार हर त्योहार की तरह संक्रांति पर भी उत्साह नजर आ रहा है.

नववारी का क्रेज

साड़ियों से दूकानें सजने लगी हैं. संक्रांति में काले रंग का महत्व होने से  काले रंग की साड़ियों की डिमांड ज्यादा है. मांग के अनुसार काले रंग की साड़ियों का स्टाक ग्राहकों के लिए उपलब्ध है. दूकानों के डिस्प्ले में भी काले रंग की साड़ियां सजाई गई हैं. साड़ियों की वैरायटी भी देखने को मिल रही है.

क्रेप, कॉटन, सिल्क, सिन्थेटिक में अनेक डिजाइन उपलब्ध हैं. बनारसी साड़ी की भी मांग काफी है. लड़कियों के लिए भी विशेष साड़ियां बाजार में उपलब्ध हैं. नववारी (लुगड़ा) का भी क्रेज है. खास बात यह है कि नववारी अब सिलकर भी मिलने लगी है. सिलाकर महिलाओं की नववारी 1,500 से 2,500 रुपये तक जाती है. वहीं लड़कियों की 750 रुपये तक सिलाई कर मिलती है.

10 करोड़ का व्यापार

इस बार मांग ज्यादा है. नागपुर में संक्रांति पर काले रंग कि सिल्क और कॉटन में डिजाइनर और वर्क वाली साड़ियों का क्रेज काफी है. सूरत और बेंगलुरु से नागपुर में साड़ियों की सप्लाई होती है. फिर संपूर्ण विदर्भ में नागपुर से साड़ियां जाती हैं. संक्रांति पर शहर में 10 करोड़ रुपये के लगभग का व्यापार होता है.

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