Monday, May 23, 2022
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मुर्दा झांक रहा था खिड़की से….यहां आज भी भटकती है रूह

 

बात 1992 की है। रायपुर से मेरा तबादला नागपुर हुआ। शहर अंजान था। मैंने पहले अकेले ही शिफ्ट होने का फैसला लिया। फैमिली छोड़कर नागपुर आ गया। घर की तलाश शुरू हुई। कंपनी के नजदीक घर नहीं मिल रहा था। मेरे मित्र सुब्रत दत्ता ने एक दिन मुझे बताया कि प्रतापनगर में दो महिलाएं रहती हैं, उन्हें पेइंग गेस्ट की जरूरत है। ऑफिस से नजदीक होने के कारण मैंने हामी भर दी। 

मैं सामान लेकर पहुंचा। देखा एक विधवा महिला और उनकी माताजी (जिन्हें मैं माजी कहता था) वहां रहते थे। उन्होंने शायद बांग्ला भाषा में आपस में कुछ बात की। माजी ने मुझे कमरा बता दिया। मैंने अपना सामान वहां रख दिया। दो लोगों के होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ था। खैर मैंने पत्नी को फोन करके घर मिलने की गुड न्यूज दी। उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे। माजी के घर पर लैंडलाइन था। उसी से फोन किया करता था। माजी बहुत धार्मिक और मिलनसार थीं। थोड़ी देर में ही घुलमिल गईं।

 रात होने लगी, मैं सोने की तैयारी में था पर वहां लगी घड़ी मेरी नींद खराब कर रही थी। कारण…बरसों पुरानी घड़ी में आज भी घंटे बजते थे। सन्नाटे में वो आवाज  बहुत ही भयानक लगती थी। खैर मैं उठा तो देखा माजी जाप कर रहीं हैं। मैंने उनसे कहा रात के 11 बज रहे हैं।घड़ी की आवाज से सो नहीं पा रहा हूं।इसे बंद कर देता हूं। माजी बोलीं ऐसा मत करो, जाओ सो जाओ। मेरी कुछ समझ में नहीं आया। थका होने के कारण थोड़ी देर में मुझे नींद आ गई। सुबह ऑफिस चला गया पर दिन भर मेरे दिमाग में माजी की बात खटकती रही। शाम को घर लौटकर मैंने माजी से अपनी बात कही। वो बोलीं कुछ नहीं है,ये जो मेरी बेटी है ना, उसके पति ने अपनी पहली पेंशन से ये घड़ी खरीदी थी और वो ही इसकी देखभाल किया करते थे। 4 साल पहले उनकी मौत हो गई। तबसे कोई इस घड़ी को हाथ नहीं लगाता। मैंने कहा चलिए अच्छा हुआ आपने वजह बता दी। दिनभर से मैं बेचैन था।

 समय निकल रहा था। मुझे अच्छा लगने लगा था। फैमिली शिफ्ट करने की सोचने लगा। बारिश के दिन थे एक दिन  अचानक आंधी चलने लगी।दिन में अंधेरा छाने लगा। थोड़ी देर में बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। मेरी छुट्टी का दिन था सो मैं भी निश्चिंत होकर अखबार पढ़ने लगा। अभी बस कुछ पढ़ना शुरू ही किया था कि मुझे किसी पुरूष की बात करने की आवाज आई। मैं समझा माजी से मिलने कोई मेहमान आया होगा। बहुत देर तक आवाज आती रही। मैंने जैसे ही अखबार रखा किसी ने मुझे आवाज देकर बुलाया। पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। मैं दूसरे कमरे में माजी के पास गया। देखा वो सोफे पर सो रहीं थीं। मैंने उन्हें उठाकर सारी बात बताई। वो बोलीं यहां तो कोई नहीं आया। शायद 7 बज रहे होंगे। बारिश भी थमने लगी। खैर मन का वहम मानकर मैं सो गया।  

सब ठीक चल रहा था। एक दिन ऑफिस से घर आने में देर हो गई। माजी ने दरवाजा खोला। थोड़ी देर बात गप्पे मारने के बाद मैं सोने चला गया। शायद 11.30 बज रह थे। मैं लाइट बंद करके सोने ही जा रहा था कि अचानक मुझे ऐसा लगा कि सामने की खिड़की में से लगातार एकटक कोई मुझे देख रहा है। मैं जैसे ही खिड़की के करीब पहुंचा। वो गायब हो गया। मैं समझ गया ये चोर है। कुर्सी पर आकर बैठ गया। घड़ी के घंटे से समय पता चलता था पर आज घंटे नहीं बज रहे थे। घड़ी शायद खराब हो गई थी। मैंने सोचा माजी को बता दूं। दूसरे कमरे में आया। देखा वो सो रहीं थीं। जैसे ही मैं जाने के लिए मुड़ा तो मैंने साफ देखा बनियान और लुंगी पहना हुआ 7 फीट के आसपास लंबा एक साया उस कमरे खिड़की से अंदर झांक रहा है। अब मुझे डर लगने लगा। मैं अपने कमरे की तरफ भागा।पर मेरे रूम की खिड़की में मुझे फिर वही साया दिखा। मैं चिल्लाकर माजी के कमरे की तरफ भागा। न तो माजी उठी और न ही उनकी बेटी। अब मैंने पूरे घर की लाइट जला दी और अपने रूम में आकर बेड पर बैठ गया। अचानक बेड हिला और ऐसा लगा बेड पर कोई बैठा है। फिर वही मन का वहम। 

पर मैं गलत था वही साया बिल्कुल मेरे पास था। मैं बुरी तरह चिल्लाकर घर से बाहर भागा और सीधा कंपनी आकर रूका। चपरासी से कहा पानी पिला। सारी रात खौफनाक थी। मैंने सोच लिया कि अब मैं वहां नहीं रहूंगा। सुबह जैसे- तैसे हिम्मत जुटाकर सामान लेने गया तो ये देखकर मैं हतप्रभ रह गया। देखा घड़ी चल रही है। घंटे भी बज रहे हैं। मुझे काटो तो खून नहीं। मैंने माजी को सारा किस्सा सुनाया पर वो अनभिज्ञ बनीं रहीं। 

बाद में पड़ोसी कुलकर्णी ने बताया कि घर के मालिक का साया यहां कई लोगों को दिखता है।कई लोगों ने अपने अनुभव बताएं हैं। आज भी उस रात को याद करके सिहर उठता हूं। ये घर की तस्वीरें जो आप देख रहे हैं-सिर्फ 1 दिन पुरानी है। मैं यहां से गुजरा तो तस्वीर ले ली ताकि आपसे ये स्टोरी शेयर कर सकूं। ये घर आज भी बंद पड़ा है। बिल्डर भी इसे हाथ नहीं लगाते। माजी और उनकी बेटी तो बहुत पहले ही चल बसे। जो हैं…वो यूएस में हैं। इस घर के और भी बहुत से किस्से हैं….फिर कभी।           लेखक : आनंद देशपांडे

इसी खिड़की से झांकता था मुर्दा। कई सालों से ये घर बंद पड़ा है।

                                   

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