Monday, May 23, 2022
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‘पंचवटी’ से हुआ मेरे लेखकीय जीवन का आरंभ

 र्ष 1976 में मैं बीए प्रथम वर्ष की परीक्षा में अनुतिर्ण  हुआ तो पढ़ाई पर कुछ विराम लगा । मैं रोजगार की तलाश में लग गया। परंतु मुझे कक्षा 9 ,10, 11 में पढ़ीं कविताएं और साहित्य बराबर याद रहे। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी तो मुझे आज भी कंठस्थ है। कवि सेनापति और पद्माकर के कविताएं मुझे बहुत प्रिय थीं। यही कारण है कि मैं जब पैदल जाता था तो रास्ते में पद्माकर सेनापति और पंचवटी की पंक्तियां बोलते हुए चलता था कुछ ही दिन हुए की अब मेरा मस्तिष्क पद्माकर की कविता बगरों बसंत बगरू बसंत है के तर्ज पर कुछ मनगढ़ंत पंक्तियां गुनगुनाने लगा। मेरे पिताजी ने मुझे एक डायरी दी थी उस डायरी पर उन पंक्तियों को लिखने लगा हालांकि मुझे स्वयं को वह पंक्तियां अच्छी लगती थी और प्रतिदिन ही उन पंक्तियों में कुछ पंक्तियां जुड़ती रही।  किंतु वे निरर्थक और निराकार ही थी।

 मेरे दो मित्र उस समय शायराना अंदाज में रहते थे पहले का नाम आनंद राय और दूसरे का नाम कमल नयन पांडे था । यह दोनों मित्र की संगत में मैं कुछ और पंक्तियां , तुकबंदी में बोलते और घर में आकर डायरी में लिपिबद्ध करता। प्रथम आनंद राय आगे चलकर फिल्म व्यवसाय में चले गये, जबकि कमल नयन जी पूर्णरूपेण कृषि कार्य हेतु इलाहाबाद स्थित उनके पैतृक निवास ग्राम बालक मऊ में बस गए।

कृष्णदेव चतुर्वेदी,भोजपुरी कवि

मैं भोपाल में ही पिताजी के साथ रहते हुए कमोवेश  रोजगार की तलाश में लगा रहा तथा समय-समय पर विभिन्न विभागों कार्यालयों में कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा था। इसी बीच भोपाल के जहांगीराबाद के बरखेड़ी मोहल्ले में संचालित प्राइवेट स्कूल में शिक्षण कार्य करने लगा । यहां मेरी मुलाकात संजय अंत्रीवाले जी से हुई। संजय  भोपाल आकाशवाणी में संचालित युवावाणी कार्यक्रम में उद्घोषक का कार्य भी करते थे। एक दिन अनायास ही उन्होंने मुझसे कहा कि आप एक मुक्तक लिखिए जो 6 पंक्तियों की हो तथा उसके अंतिम पंक्ति के अंत में गजरा शब्द आना चाहिए। मैंने उन्हें तीन-चार मुक्तक लिखकर दिए। जिसमें से एक मुक्तक उन्होंने पोस्टकार्ड पर लिखकर दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘कादंबिनी’ को प्रेषित कर दिया! यह मुक्तक कादंबिनी (सितंबर 1986) के अंक  में तृतीय पुरस्कार के साथ प्रकाशित भी हो गई जिसकी पुरस्कार राशि मुझे मनीआर्डर द्वारा प्राप्त हो गई। अब मैंने संजय  को यह बात बताई तो हम लोग सितंबर 1986 की कादंबिनी की खोज में जुटे। ढूंढते- ढूंढते भोपाल के न्यू मार्केट के एक बड़ी पुस्तक विक्रेता के यहां यह अंक मिल गया। हमने बड़ी उत्सुकता से देखा तो उसमें मेरे द्वारा लिखा गया मुक्तक छपा था जो इस प्रकार है –

       तोड़ लिया माली ने मुझको

      अंतर   ज्वाल   मिटाने   को  

      गूंथ  दिया  धागे  में  मुझको   

      युग का  मन ललचा  ने  को 

      हुआ  कलंकित  मेरा जीवन

      बनकर   केशों   का   गजरा।

    हम दोनों मित्रों को बहुत खुशी हुई । मेरे इस गुण को उन्होंने बहुत सराहा। इसी समय मैं शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में चयनित कर लिया गया तथा संजय  मध्य प्रदेश विद्युत मंडल में चयनित होकर अन्यत्र चले गए , किंतु वे मेरे मन को लेखन के प्रति जागृत कर गए। मेरे पास बिजनौर से प्रकाशित एक पत्रिका “अचिंत्य ” की नमूना प्रति आई। मैंने अचिंत्य शीर्षक से ही एक कविता लिखी और प्रेषित कर दी। वह कविता भी उसमें छपी और मेरा रुझान कविताएं लिखकर छपवाने की ओर बढ़ता गया मैं कविता लिखता और कई पत्र-पत्रिकाओं में  भेज देता। मेरी कविताएं हर उस पत्रिका में प्रकाशित हो जाती जिसमें मैं भेजता।

 यह सिलसिला चल पड़ा और मैं धीरे- धीरे कवि के रूप में जाना जाने लगा। अब मैं भोपाल के हिंदी भवन से जुड़ चुका था। साथ ही भोपाल की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था कला मंदिर का सदस्य बन गया। नियमित काव्य गोष्ठीयों में सहभागिता करने लगा था। यहां पर मेरी बृजभाषी हिंदी के प्रख्यात कवि हुकुम पाल सिंह विकल से भेंट हुई। इन्होंने मुझे सराहा और कहा कि आपके पास शब्दों और विषयों की कमी नहीं है ।

 आगे चलकर जब राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने पहले हम 40 एवं बाद में हम भारतीय अभियान की शुरुआत की तो मैं प्रसिद्ध कवि डॉक्टर कमलेश शर्मा, भोपाल ( अभियान के प्रदेश प्रभारी ) से जुड़ गया तथा हम भारतीय शिविरों का आयोजन हेतु कार्य करने लगा।शिक्षण काल के दौरान मेरी मुलाकात शिक्षक आठ्या से हुई। वे तरुण भारती शीर्षक से एक मासिक पत्रिका प्रकाशित करते थे जिसमें उन्होंने मुझे स्थान दिया और सहायक संपादन का कार्य भी सौंपा । यह पत्रिका धीरे- धीरे चल निकली ।  आठ्या  आज भी “शिल्प पक्ष साप्ताहिक एवं “चडार संवाद” मासिक पत्रिका प्रकाशित कर रहे हैं।

 धीरे – धीरे मैं देश के दर्जनभर प्रांतों से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगा। मैंने अपनी कविताओं को सहेजने हेतु भी कुछ कार्य किया जिसमें सबसे पहले पानी बचाओ अभियान पर आधारित पुस्तिका चीखती नदी, शिक्षा योजना धतूरिया , “हम भारतीय शिविर” सार संग्रह, “कब आएगी नानी” कथा संग्रह, “अपनी डफली अपना राग”व्यंग कविता संग्रह,”शब्द आपके बन गए शिक्षक”कविता संग्रह, “जाग हो बलमुआ” भोजपुरी गीत संग्रह आदि प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में पांच पांडुलिपियां तैयार हैं जो जल्द ही आप सबके सामने होंगी।

 ( राजीव कुमार झा से बातचीत पर आधारित)
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